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International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary
ISSN: 2583-7397
Open Access • Peer Reviewed
Impact Factor: 5.67

International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2026;5(5):1229-1236

समकालीन हिंदी उपन्यासों में स्त्री विमर्श और प्रतिरोध

Author Name: Sangam;   Dr. Vijay Kumar Chaubey;  

1. Research Scholar, Department of Hindi, Mathura P. G. College, Rasra, Ballia, Uttar Pradesh, India Affiliated to: Jananayak Chandrashekhar University in Ballia, Uttar Pradesh, India

2. Assistant Professor, Department of Hindi, Mathura P. G. College, Rasra, Ballia, Uttar Pradesh, India Affiliated to: Jananayak Chandrashekhar University in Ballia, Uttar Pradesh, India

Paper Type: research paper
Article Information
Paper Received on: 2026-08-16
Paper Accepted on: 2026-10-09
Paper Published on: 2026-10-14
Abstract:

समकालीन हिंदी उपन्यासों में स्त्री-विमर्श और प्रतिरोध एक महत्वपूर्ण साहित्यिक एवं सामाजिक विमर्श के रूप में उभरकर सामने आया है। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य समकालीन हिंदी उपन्यासों में स्त्री की स्थिति, अस्मिता, स्वतंत्रता, स्वायत्तता तथा पितृसत्तात्मक व्यवस्था के विरुद्ध उसके प्रतिरोध के विभिन्न स्वरूपों का अध्ययन करना है। समकालीन हिंदी उपन्यासों में स्त्री अब केवल पारंपरिक भूमिकाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व, आत्मसम्मान और अधिकारों के प्रति सजग दिखाई देती है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि स्त्री प्रतिरोध केवल प्रत्यक्ष विद्रोह तक सीमित नहीं है। चुप्पी तोड़ना, सामाजिक रूढ़ियों पर प्रश्न उठाना, शिक्षा प्राप्त करना, आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल करना तथा जीवन से संबंधित निर्णय स्वयं लेना भी प्रतिरोध के महत्वपूर्ण स्वरूप हैं। कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, मृदुला गर्ग, मैत्रेयी पुष्पा, प्रभा खेतान और चित्रा मुद्गल जैसे रचनाकारों के चयनित उपन्यासों में स्त्री चेतना के विविध आयाम दिखाई देते हैं। इन उपन्यासों में स्त्री की देह, इच्छाओं, पारिवारिक संबंधों, सामाजिक बंधनों और आर्थिक संघर्षों को महत्वपूर्ण रूप से प्रस्तुत किया गया है। अध्ययन यह निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि समकालीन हिंदी उपन्यास स्त्री को एक निष्क्रिय पात्र के रूप में नहीं, बल्कि संघर्षशील, चेतनाशील और परिवर्तनकारी शक्ति के रूप में स्थापित करते हैं। स्त्री-विमर्श एवं प्रतिरोध की यह चेतना सामाजिक समानता, न्याय, स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा की स्थापना की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

Keywords:

समकालीन हिंदी उपन्यास, स्त्री-विमर्श, स्त्री अस्मिता, पितृसत्ता, स्त्री प्रतिरोध, स्वतंत्रता, स्वायत्तता।

How to Cite this Article:

Sangam,Dr. Vijay Kumar Chaubey. समकालीन हिंदी उपन्यासों में स्त्री विमर्श और प्रतिरोध. International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary. 2026: 5(5):1229-1236


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