International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2025;4(6):765-769
ज्ञानप्रकाश विवेक की कहानियों में सामाजिक यथार्थ और स्त्री विमर्श
Author Name: बिन्दर कुमारी; डॉ. मुकेश कुमार;
Paper Type: research paper
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Abstract:
ज्ञानप्रकाश विवेक हिंदी कथा-साहित्य के उन विशिष्ट रचनाकारों में हैं जिन्होंने आधुनिक समाज की जटिलताओं, वर्गीय अंतर्विरोधों और स्त्री की बदलती स्थिति को अत्यंत संवेदनशीलता एवं यथार्थपरक दृष्टि से चित्रित किया है। उनके कथा-संसार में सामाजिक यथार्थ और स्त्री विमर्श केवल दो भिन्न प्रवृत्तियाँ नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक रूप में उपस्थित हैं। विवेक की कहानियाँ समाज के भीतर व्याप्त पितृसत्तात्मक संरचनाओं, आर्थिक असमानताओं, और नैतिक विघटन पर तीखा प्रहार करती हैं। उनकी नायिकाएँ केवल शोषण की प्रतीक नहीं, बल्कि नारी चेतना, आत्म-सजगता, और प्रतिरोध की शक्ति की प्रतीक हैं। वे अपने अस्तित्व की खोज में समाज के पूर्वनिर्धारित मानदंडों को चुनौती देती हैं। विवेक की रचनाएँ यह संकेत करती हैं कि स्त्री की अस्मिता केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक पुनर्निर्माण की प्रक्रिया का अनिवार्य तत्व है। उनका साहित्य मानवतावाद और समता की चेतना से ओतप्रोत है, जहाँ स्त्री की स्वतंत्रता को समाज के विकास से जोड़ा गया है। विवेक का कथा-संसार हमें यह सोचने पर विवश करता है कि जब तक स्त्री की आवाज़ को समान महत्व नहीं दिया जाएगा, तब तक कोई भी समाज पूर्ण नहीं हो सकता। यह शोधपत्र विवेक के कथा-साहित्य में सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति, स्त्री विमर्श की वैचारिक प्रासंगिकता, और नारी संघर्ष की बहुआयामी उपस्थिति का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
Keywords:
सामाजिक यथार्थ, स्त्री विमर्श, नारी चेतना, अस्मिता, आत्मनिर्भरता, पितृसत्ता, मानवीय संवेदना, प्रतिरोध, समानता, मानवतावाद
How to Cite this Article:
बिन्दर कुमारी,डॉ. मुकेश कुमार. ज्ञानप्रकाश विवेक की कहानियों में सामाजिक यथार्थ और स्त्री विमर्श. International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary. 2025: 4(6):765-769
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