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International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary
ISSN: 2583-7397
Open Access • Peer Reviewed
Impact Factor: 5.67

International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2026;5(2):967-971

खोखले गाँव: कुमाऊँ के ग्रामीण समाज का समाजशास्त्रीय विश्लेषण

Author Name: डॉ. सत्यमित्र सिंह;  

1. असिस्टेंट प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, रानीखेत, उत्तराखंड, भारत

Paper Type: research paper
Article Information
Paper Received on: 2026-04-08
Paper Accepted on: 2026-04-27
Paper Published on: 2026-04-30
Abstract:

यह अध्ययन उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में उभर रही “खोखले गाँव ” की समस्या का समाजशास्त्रीय विश्लेषण प्रस्तुत करता है। पिछले कुछ दशकों में तीव्र प्रवासन (Migration), जनसंख्या में गिरावट तथा संरचनात्मक परिवर्तन ने ग्रामीण समाज की पारंपरिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया है। यद्यपि गाँवों में भौतिक संरचनाएँ—जैसे घर और भूमि—अभी भी विद्यमान हैं, किंतु सामाजिक जीवन की सक्रियता में उल्लेखनीय कमी आई है, जिससे “खोखलापन” उत्पन्न हुआ है।

यह शोध मिश्रित पद्धति (Mixed Method) पर आधारित है, जिसमें मात्रात्मक (Quantitative) एवं गुणात्मक (Qualitative) दोनों दृष्टिकोणों का उपयोग किया गया है। प्राथमिक आँकड़े प्रश्नावली (Questionnaire), गहन साक्षात्कार (In-depth Interview) तथा समूह चर्चा (Focus Group Discussion) के माध्यम से संकलित किए गए, जबकि द्वितीयक स्रोतों में भारत की जनगणना (Census of India, 2011) एवं सरकारी रिपोर्टें शामिल हैं। अध्ययन में छह गाँवों के 120 परिवारों का चयन किया गया, जो प्रवासन की विभिन्न अवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।

अध्ययन के निष्कर्ष दर्शाते हैं कि प्रवासन के कारण युवाओं की संख्या में कमी, ग्रामीण परिवारों का स्त्रीकरण (Feminization), तथा बुजुर्गों में सामाजिक एकाकीपन बढ़ा है। संयुक्त परिवार प्रणाली का विघटन हो रहा है और सामुदायिक संस्थाएँ निष्क्रिय होती जा रही हैं। साथ ही, सांस्कृतिक परंपराएँ और स्थानीय पहचान भी क्षीण हो रही हैं, जो व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक संकट की ओर संकेत करती हैं।

अंततः, यह अध्ययन दर्शाता है कि “खोखले गाँव” केवल जनसांख्यिकीय (Demographic) समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक एवं संस्थागत विघटन की बहुआयामी प्रक्रिया है। यह एक विरोधाभास को भी रेखांकित करता है, जहाँ प्रवासन आर्थिक लाभ (प्रेषण धन—Remittance) तो प्रदान करता है, किंतु सामाजिक एकता को कमजोर करता है। अतः सतत एवं समावेशी ग्रामीण विकास हेतु संदर्भ-विशिष्ट नीतिगत हस्तक्षेपों की आवश्यकता है।

Keywords:

खोखले गाँव, प्रवासन, कुमाऊँ, सामाजिक विघटन, ग्रामीण समाज, जनसंख्या ह्रास।

How to Cite this Article:

डॉ. सत्यमित्र सिंह. खोखले गाँव: कुमाऊँ के ग्रामीण समाज का समाजशास्त्रीय विश्लेषण. International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary. 2026: 5(2):967-971


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