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International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary
ISSN: 2583-7397
Open Access • Peer Reviewed
Impact Factor: 5.67

International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2026;5(2):756-762

भारतीय ज्ञान परंपरा व प्रणाली

Author Name: डॉ. राकेश कुमार;  

1. सहायक प्राध्यापक, हिंदी विभाग, ऐ.के. गोपालन डिग्री कॉलेज, सुल्तानगंज, भागलपुर तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर

Paper Type: review paper
Article Information
Paper Received on: 2026-03-15
Paper Accepted on: 2026-04-18
Paper Published on: 2026-04-23
Abstract:

प्राचीन ज्ञान परंपरा ने हमारे सर्वांगीण विकास पर ध्यान केंद्रित किया तथा शिक्षा का स्वरूप एक व्यावहारिकता को प्राप्त करने के लिए जीवन की सहायक सिद्ध हुआ संपूर्ण वैदिक काल में जैसे रामायण, महाभारत, पुराण,ग्रंथ, दर्शन, स्मृति ग्रंथ,काव्य, नाटक ,व्याकरण तथा ज्योतिषी शास्त्र संस्कृत भाषा में उपलब्ध कराया था इनकी महिमा को आगे बढ़ाने के लिए जो हमारे भारतीय  सभ्यता, संस्कृति की रक्षा करने में पूर्णता सिद्ध होती है संस्कृत ज्ञान से ही संस्कार और समाज का निर्माण करती है संस्कार से कई ऐसे महत्वपूर्ण बिंदु है जैसे कायिक , वाचिक मानसिक पवित्रता के साथ पर्यावरण, पर्यावरण को शुद्ध करता है जिससे हमारे शरीर के पूरे अंग को स्वच्छ बना के रखना है हमारे समाज के बदलते परिवेश और भारतीय मूल्य के बीच हमारी शिक्षा व्यवस्था को अच्छा बनाना अति आवश्यक माना गया है यह हमारी समाजसेवी व्यवस्था प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा को लिए बिना नहीं चल सकती है क्योंकि एक तरफ हम तो  आज के इतिहास के दौर तेजी से हमारी ओर अग्रसर है वह हमारी संस्कृति में निहित ज्ञान विज्ञान परंपरा को भूलते जा रहे हैं इस आधुनिक काल में हमारी वही स्थिति हुई होगी जैसा की हमने अभी के देखा करते हैं जैसा की उपनिषदों में कहा गया है कि यदि  दृष्टिहीन को रास्ता दिखाने वाला भी दृष्टिहीन हुई है तो हमारे लक्ष्य की प्राप्ति कठिन हो जाएगी प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा जो वैदिक एवं उपनिषद काल में थी वह बौद्ध और जैन धर्म के काल में भी रही यह विभिन्न विश्वविद्यालय की स्थापना और शिक्षा व्यवस्था को स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है लेकिन अब विगत 200 से 300 वर्षों में हुआ है हमारे राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूप रेखा में इसे उचित रूप में दिखाने का आवश्यक काम करता है प्राचीन काल में ऋषि मुनियों के द्वारा एक आस्था का मूल्य, आदर्श, दर्शन ,ज्ञान, संस्कृति, सभ्यता, संस्कार, पद्धति, कर्म, भक्ति इत्यादि जीवन के भावनाएं समाहित है यह परंपरा किसी एक तत्व को लेकर चलने वाली नहीं वरन, एक व्यापक रूप है भारतीय ज्ञान परंपरा क्या है इस जिज्ञासा के मन में उड़ने ही कल्पना वेदों की ओर चल जाती है और वेद का भारतीय संस्कृति ज्ञान और सभ्यता का मूल है इनमें समस्त भाषाओं का ज्ञान, ज्ञान के समस्त स्वरूपों का जन्म हुआ है संस्कृति  को उत्तरी कहे जाने वाली हिंदी इस ज्ञान को विभिन्न बुद्धियों के रूप में प्रत्येक छात्रों तक पहुंचती है इस ज्ञान परंपरा का निर्वहन करते हुए हिंदी परंपरा अपने कर्म पद पर अग्रसर होता है हिंदी साहित्य से भारतीय ज्ञान परंपराएं सनातन धर्म के वशिष्टिया से परिपूर्ण होकर इस विश्व को निरंतर पादीपुरा नेता का आभास कराती है इसका प्रभाव  विश्व को प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त किए जाते हैं भारतीय संस्कृति के विभिन्न अंग प्राचीन जीवन मूल्य पंच महायज्ञ, शोडेक्स संस्कार, तीन ऋणी, भारतीय आयुर्वेद पद्धतियों, भारतीय शिक्षा पद्धति ,वैदिक ज्ञान, उपनिषद विद्यालय पुराणों में निहित व्यवहारिक ज्ञान कौशल की और था सामग्र शरीर वह मानसिक स्वास्थ्य को आकार देने वाली अष्टांग योग पद्धति प्राकृतिक के प्रति भारतीय साहित्य में एक अद्भुत पोषण स्वास्थ्य व संरक्षण देने का काम करती है दर्शन शास्त्रों में व्याप्त आध्यात्मिक ऊर्जाएं विभिन्न शक्तियों के रूप धारण कर विश्व के कान-कान में भारतीय ज्ञान परंपराओं की आवाज बनकर अभिव्यक्त करती है। निष्कषर्ः प्राचीन ज्ञान प्रणाली विश्व के अन्य देशों से श्रेष्ठ मानी जाती थी भारत में कई अन्य देश के छात्र ज्ञान अर्जन हेतु भारत आया करते थे।

Keywords:

ज्ञान, परंपरा, संस्कृति, सांस्कृतिक मूल्य, पाठ्यचर्या

How to Cite this Article:

डॉ. राकेश कुमार. भारतीय ज्ञान परंपरा व प्रणाली. International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary. 2026: 5(2):756-762


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