International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2026;5(5):475-478
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण में प्रकृति-तत्व विमर्श: पंचविधा आद्याशक्ति का दार्शनिक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन
Author Name: दीपक राज थपलियाल; डॉ. सुभाष बडोला;
Abstract
देवी भागवत पुराण (नवम स्कंध) के अनुसार, जगदम्बा की यह पाँचों अभिव्यक्तियाँ (दुर्गा, राधा, लक्ष्मी, सरस्वती और सावित्री) ब्रह्मांडीय संचालन के विभिन्न पहलुओं को नियंत्रित करती हैं। यदि इन्हें पृथक-पृथक न देखकर एक समेकित (Integrated) दृष्टिकोण से विश्लेषित किया जाए, तो यह पंचदेवता अवधारणा सृष्टि संचालन के पाँच अनिवार्य स्तम्भों को एक ही चेतना-सूत्र में पिरोती हैः
समग्र दृष्टिकोण से, यह अवधारणा सृष्टि संचालन के पाँच अनिवार्य स्तम्भोंकृसंरक्षण (दुर्गा), प्रेम (राधा), पोषण (लक्ष्मी), ज्ञान (सरस्वती) तथा अनुशासन (सावित्री)कृको एक ही चेतना सूत्र में पिरोती है। यदि इनमें से एक भी तत्त्व अनुपस्थित हो, तो सृष्टि की व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी, क्योंकि ज्ञान के बिना वैभव विनाशकारी होता है, शक्ति के बिना साधना असुरक्षित होती है, और प्रेम व विवेक के बिना समृद्धि निष्प्राण हो जाती है। अतः देवी भागवत का यह पंचदेवी दर्शन आद्यशक्ति जगदम्बा की संपूर्णता और एकत्व (Unity) का निरूपण करता है।
श्रृष्टि के शुभारंभ हेतु परम पुरुष योगमाया का आश्रय ग्रहण करके स्वयं को दो भागों में प्रकट करते हैं। इसमें दाहिना भाग पुरुष (श्रीकृष्ण) तथा बायाँ भाग मूल प्रकृति (आद्याशक्ति) कहलाता है। यह सिद्धांत स्पष्ट करता है कि श्रृष्टि की रचना हेतु शक्ति और शक्तिमान दोनों की उपस्थिति अनिवार्य है।
भगवान कहते है हे नारद! इसलिए योगीजन परमात्मा में स्त्री और पुरुष भाव में भेद नहीं समझते हैं और सब कुछ ब्रह्ममय है ऐसा निरन्तर चिंतन करते हैं, भगवान श्रीकृष्ण की इच्छा से ही वे मूल प्रकृति भगवती श्रृष्टि करने की कामना से सहसा प्रकट हो गयीं। उनकी आज्ञा से भिन्न-भिन्न कर्मों की अधिष्ठात्री होकर एवं भक्तों के अनुरोध से उन पर अनुग्रह करने हेतु विग्रह धारण करने वाली वे पाँच रूपों में अवतरित हुईं।
Keywords
श्रीमद्भागवतपुराण, प्रकृति-तत्व, पंचविधा आद्याशक्ति, सांख्य दर्शन, माया-शक्ति, दार्शनिक अध्ययन