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IJCRM
International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary
ISSN: 2583-7397
Open Access • Peer Reviewed
Impact Factor: 5.67

International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2024;3(5):323-325

विविध विमर्श के सन्दर्भ में हिन्दी साहित्य का अस्तित्व

Author Name: डॉ. सुजाता मगदुम;  

1. प्राचार्या तथा हिन्दी सह-प्राध्यापिका, सरकारी पदवी महाविद्यालय, सदलगा, कर्नाटक, भारत

Abstract

प्रस्तुत आलेख आधुनिक काल, विशेषतः 2000 ई. के पश्चात हिन्दी साहित्य में उभरे विविध विमर्शों का विश्लेषण करता है। तकनीकी विकास और मीडिया की प्रगति के कारण साहित्य के पाठक-वर्ग में आई कमी तथा अति बौद्धिकता के कारण उत्पन्न पाठकीय अरुचि की चर्चा करते हुए लेखिका यह प्रतिपादित करती हैं कि साहित्य का स्वरूप सदैव समाज के अनुरूप परिवर्तनशील रहा है। 21वीं सदी को विमर्शों की सदी बताते हुए आलेख में स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, किन्नर-विमर्श तथा वृद्ध-विमर्श का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया गया है। स्त्री-विमर्श के अंतर्गत पितृसत्तात्मक व्यवस्था के विरुद्ध नारी-अस्मिता व स्वतंत्रता के संघर्ष को प्रतिनिधि उपन्यासों के उदाहरण सहित दर्शाया गया है। दलित-विमर्श में सदियों के शोषण के विरुद्ध दलित साहित्यकारों द्वारा उठाई गई स्वत्व-चेतना की आवाज़ को रेखांकित किया गया है। किन्नर-विमर्श के अंतर्गत तृतीय लिंग समुदाय की पीड़ा, तिरस्कार एवं उन्हें मुख्यधारा में लाने के प्रयासों का चित्रण करनेवाली रचनाओं की चर्चा की गई है। वृद्ध-विमर्श के दो आयामों—परंपरागत आदर्श मूल्यों तथा पितृसत्ता के विरुद्ध युवा-चेतना—को पौराणिक एवं आधुनिक कथा-साहित्य के उदाहरणों से स्पष्ट किया गया है। निष्कर्षतः आलेख यह स्थापित करता है कि ये विमर्श युगीन सामाजिक अन्याय व शोषण के विरुद्ध उपजे साहित्यिक प्रत्युत्तर हैं, जो साहित्य और समाज के बीच सार्थक संवाद स्थापित करते हैं।

Keywords

साहित्यिक विमर्श, स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, किन्नर-विमर्श, वृद्ध-विमर्श, नारी अस्मिता, पितृसत्ता, तृतीय लिंग, सामाजिक शोषण, समकालीन हिन्दी साहित्य