International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2026;5(5):422-427
एक जननायक के रूप में महाराजा छत्रसाल का व्यक्तित्व एवं कृतित्व
Author Name: रामेश्वर दुबे;
Abstract
महाराजा छत्रसाल सच्चे स्वाधीनता प्रेमी थे। स्वाधीनता के भाव से ही उन्होंने मुगल सम्राटों के विरुद्ध लगातार युद्ध करके देश के धर्म, संस्कृति, उनके मूल्यों और प्रतीकों की रक्षा हेतु संघर्ष किया। दिल्ली दरबार से परिचालित होने वाले जन विरोधी निर्णयों के खिलाफ ही उनके पिता चपंतराय का विद्रोह था, जो आजीवन जारी रहा उसी को उनके सपूत छत्रसाल ने आगे बढ़ाया। स्वधर्म, स्वसंस्कृति तथा स्वराज्य के भाव पर भी पूरा बुन्देलखण्ड का जनसमर्थन उनके साथ था। छत्रसाल समस्त धर्मों तथा सम्प्रदायों में विश्वास करने वाले शासक थे। कुछ लोगों के द्वारा उन्हें विशिष्ट संप्रदाय का विरोधी या विशिष्ट संप्रदायों में बाँधने का प्रयत्न किया गया है, जिसके तहत् कोई हरिदासी, सखी सम्प्रदायी या निम्बार्क सम्प्रदाय का मानता है।
प्रणामी धर्म के अनुयायी उन्हें पाँच स्वरूपों में से एक मानकर उनकी पूजा करते हैं। कुछ उन्हें कट्टर हिन्दू की उपाधि देने से नहीं चूकते जबकि ये सब तथ्य असत्य साबित होते हैं जब हम गहराई से विचार करते हैं। सच तो यह है कि उनका विरोध अत्याचारी मुसलमानों और हिन्दुओं दोनों से था। उन्होंने कभी कोई मस्जिद नहीं गिराई और न किसी मुस्लिम धर्मग्रंथ का अपमान किया वरन् फत्ते खान, नाहर खान, ईसफ खान आदि मुसलमानों को अपनी सेना में महत्वपूर्ण पदों पर रखा और युद्ध में मृत मुसलमानों की कब्रें तक बनवाई। असलियत यह है कि उस समय मुसलमानों की अन्यायी सत्ता का विरोध धर्म का विरोध हो गया था। छत्रसाल ने सत्ता का प्रतिकार किया किन्तु सत्ताहीन मुसलमानों को संरक्षण प्रदान किया। रचनाओं में साक्ष्य से वे राधा - कृष्ण, राम, देवी, शिव, हनुमान आदि सभी देवी-देवताओं के भक्त ठहरते है। वे सच्चे मायनों में एक उदार हिन्दू थे इसीलिए उन्होंने सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता और सम्मान का भाव रखा था।
इस तरह हम पाते हैं कि छत्रसाल सच्चे मायनों में राष्ट्रभक्त स्वाधीनता की आग को अपने अंतस में छिपाये वह योद्धा थे जिनकी तलवार व कलम के सामने समकालीन राजसत्ताएँ नत मस्तक थीं तथा उन्हें व्यापक जन समर्थन प्राप्त था ।
Keywords
महाराजा छत्रसाल; जननायक; बुंदेलखंड; स्वाधीनता संघर्ष; ऐतिहासिक व्यक्तित्व