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International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary
ISSN: 2583-7397
Open Access • Peer Reviewed
Impact Factor: 5.67

International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2026;5(5):382-384

‘बाबल तेरे देस में’ स्त्री अस्मिता का प्रश्न

Author Name: कु. सोनी;   डॉ. नरेंद्र कुमार;  

1. शोध छात्रा, हिंदी विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, भारत

2. शोध निर्देशक, हिंदी विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, भारत

Abstract

अस्मिता व्यक्ति अथवा समुदाय की उस विशिष्ट पहचान और आत्मबोध को अभिव्यक्त करती है, जिसके माध्यम से वह स्वयं को समाज में स्थापित करता है और अपनी पहचान की सामाजिक स्वीकृति की अपेक्षा करता है। समकालीन हिंदी साहित्य में अस्मिता-विमर्श विशेष रूप से वंचित और उपेक्षित समुदायों के अनुभवों, संघर्षों तथा अस्तित्व की खोज से जुड़ा हुआ है। इसी संदर्भ में स्त्री-विमर्श पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचनाओं, रूढ़ मान्यताओं, लैंगिक भेदभाव और स्त्री-शोषण के विरुद्ध चेतना एवं प्रतिरोध का महत्वपूर्ण स्वर है।

प्रस्तुत शोध में भगवानदास मोरवाल के उपन्यास ‘बाबल तेरा देस में’ का स्त्री-विमर्श और अस्मिता की दृष्टि से विश्लेषण किया गया है। उपन्यास में मेवात अंचल के सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश के माध्यम से मुस्लिम स्त्रियों के जीवन, उनकी सामाजिक स्थिति, पारिवारिक एवं लैंगिक शोषण, दहेज-प्रथा, यौन उत्पीड़न, संपत्ति संबंधी अधिकारों और पितृसत्तात्मक व्यवस्था की जटिलताओं को चित्रित किया गया है। जैनब, जुम्मी, चंद्रकला, शकीला, पारो, मुमताज, बत्तो और दादी जैतूनी जैसे स्त्री पात्रों के माध्यम से स्त्री की पीड़ा के साथ-साथ उसके प्रतिरोध, आत्मसम्मान, चेतना और अस्तित्व-बोध को भी सामने लाया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि मोरवाल का उपन्यास केवल स्त्री-शोषण का दस्तावेज नहीं है, बल्कि स्त्री की अस्मिता की रक्षा और उसके अधिकारों के प्रति सामाजिक चेतना विकसित करने का सशक्त साहित्यिक प्रयास भी है। उपन्यास की स्त्रियाँ परिस्थितियों की निष्क्रिय पीड़ित मात्र न रहकर अन्याय के विरुद्ध प्रतिकार और आत्मसम्मान की चेतना का परिचय देती हैं। इस प्रकार ‘बाबल तेरा देस में’ स्त्री-अस्मिता, सामाजिक न्याय और लैंगिक समानता के प्रश्नों को गंभीरता से उठाने वाला महत्वपूर्ण हिंदी उपन्यास सिद्ध होता है।

Keywords

अस्मिता, स्त्री-विमर्श, स्त्री-शोषण, पितृसत्ता, महिला चेतना, मेवात, भगवानदास मोरवाल, ‘बाबल तेरा देस में’।