International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2026;5(1):679-683
मानव एवं पर्यावरण के संबंधों का ऐतिहासिक विश्लेषण
Author Name: डॉ. विमल कुमार सिंह; मोहिनी कुमारी गुप्ता;
Abstract
सम्पूर्ण पृथ्वी एक है। पर्यावरणीय समस्या सभी की समस्या है। विकास एवं पर्यावरण एक दूसरे के विपरीत स्थिति के द्योतक नहीं हैं बल्कि एक दूसरे के पूरक हैं। मनुष्य तथा उसका पर्यावरण दोनों परस्पर एक-दूसरे से इतने सम्बन्धित है कि उन्हें एक-दूसरे से अलग करना कठिन है। मनुष्य प्राकृतिक पर्यावरण का महत्त्वपूर्ण घटक है। मनुष्य प्राकृतिक पर्यावरण की आन्तरिक निर्भरता को नहीं पहचान पा रहा है। इसीलिए सभी ओर प्रदूषण फैल रहा है। प्राचीन काल से ही यह धारणा रही है कि पर्यावरण को क्षति पहुँचाने का अर्थ अपना अहित करना है। प्रायः यह देखा जाता है कि मानवीय विचारधारा तथा दृष्टिकोणों को बदलने में, धार्मिक, सामाजिक एवं नैतिक मान्यताओं का व्यापक असर देखने को मिलता है। पर्यावरण की समस्या की भयावहता को देखते हुए समाधान के हर संभव प्रयास की आवश्यकता है इसके लिए मनुष्यों में ऐसी प्रवृत्ति का विकास किया जाए, जिससे प्राकृतिक स्रोतों का दोहन कम-से-कम एवं संतुलित मात्रा में किया जाए और पृथ्वी तथा प्रकृति की पवित्रता को बनाए रखा जाए। इस दृष्टि से प्रस्तुत आलेख को गहन अध्ययन करने की आवश्यकता है। जिससे प्राकृतिक स्रोतों के दोहन से बचा जा सके और पर्यावरण प्रदूषण की समस्या को सुलझाया जा सके। मनुष्य एवं उसके पर्यावरण में सामंजस्य रखने में ही मानव का कल्याण है। जैसे-जैसे प्रकृति एवं पर्यावरण के विनाश की हमें जानकारी प्राप्त होती जा रही है, वैसे पर्यावरण की सुरक्षा एवं संवर्धन के प्रयासों की तथा विश्व के पर्यावरण को कैसे अक्षुण्य रखा जाये, इन प्रश्नों की अनिवार्यता भी बढ़ती जा रही है। पर्यावरण सम्बन्धी नैतिक एवं धार्मिक मान्यताओं के अज्ञानता के कारण पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन की समस्याओं के समाधान में इन मान्यताओं (मूल्यों) का उपयोग पूर्णरूपेण नहीं हो पा रहा है। यदि उनका उपयोग होता तो निःसंदेह पर्यावरण की समस्या का समाधान होता। भारत में पर्यावरण की संचेतना कोई नया प्रत्यय नहीं है, यह हमारी भारतीय परम्परा एवं संस्कृति तथा पर्यावरण के पारस्परिक सम्बन्धों में समाहित है।
Keywords
पर्यावरण संतुलन, सतत विकास, प्रदूषण, नैतिक मूल्य, इत्यादि।