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International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary
ISSN: 2583-7397
Open Access • Peer Reviewed
Impact Factor: 5.67

International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2024;3(6):301-310

प्रेमचन्द का दलित विषयक चिन्तन :संदर्भ और परिप्रेक्ष्य

Author Name: प्रो दीपक प्रकाश त्यागी;  

1. प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर उत्तर प्रदेश, भारत

Abstract

यह शोधपत्र प्रेमचन्द के दलित विमर्श तथा उनके सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक दृष्टिकोण का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया है कि प्रेमचन्द ने अपने साहित्य में दलित, वंचित एवं शोषित वर्गों की समस्याओं, पीड़ा और संघर्ष को अत्यंत संवेदनशीलता तथा यथार्थवादी दृष्टि से अभिव्यक्त किया। यद्यपि कुछ दलित विचारकों एवं आलोचकों ने प्रेमचन्द को दलित चेतना से पृथक तथा सवर्ण मानसिकता का प्रतिनिधि माना है, तथापि उनके साहित्य और वैचारिक लेखन का गहन अध्ययन यह प्रमाणित करता है कि वे जाति-आधारित शोषण, अस्पृश्यता, सामंतवाद और ब्राह्मणवादी व्यवस्था के प्रखर विरोधी थे। प्रेमचन्द ने दलित प्रश्न को केवल धार्मिक या सामाजिक समस्या न मानकर राष्ट्रीय, आर्थिक और मानवीय अधिकारों के प्रश्न के रूप में देखा। उनके साहित्य में दलित पात्र केवल करुणा के पात्र नहीं हैं, बल्कि संघर्ष, प्रतिरोध और आत्मसम्मान के प्रतीक भी हैं। अध्ययन यह निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि प्रेमचन्द का दलित विमर्श न तो केवल गांधीवादी है और न ही पूर्णतः अम्बेडकरवादी, बल्कि यह एक व्यापक मानवतावादी, प्रगतिशील और सामाजिक न्याय पर आधारित दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है, जो आज भी भारतीय समाज और दलित विमर्श के लिए प्रासंगिक बना हुआ है।

Keywords

प्रेमचन्द, दलित विमर्श, अस्पृश्यता, सामाजिक न्याय, अम्बेडकर, गांधीवाद, ब्राह्मणवाद, जाति व्यवस्था, मानवतावाद, सामाजिक परिवर्तन।