International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2024;3(5):304-310
संस्कारों में काल-चयन (मुहूर्त) का वैज्ञानिक विश्लेषण : जैविक घड़ी एवं ब्रह्माण्डीय लय के आलोक में
Author Name: चमन लाल; डॉ. चूड़ामणि त्रिवेदी;
Abstract
भारतीय ज्ञान-परम्परा में “काल” को केवल घटनाओं के अनुक्रम का मापक नहीं, अपितु एक सजीव, सक्रिय एवं नियामक शक्ति के रूप में स्वीकार किया गया है। वेद, उपनिषद, स्मृति एवं ज्योतिष ग्रंथों में काल की सत्ता को सर्वव्यापी एवं सर्वनियामक बताया गया है। षोडश संस्कारों की परम्परा में प्रत्येक संस्कार के लिए विशिष्ट मुहूर्त का निर्धारण किया गया है, जो यह संकेत करता है कि प्राचीन भारतीय मनीषियों ने समय के महत्व को अत्यन्त गहराई से समझा था।
सामान्यतः मुहूर्त-विज्ञान को धार्मिक आस्था या ज्योतिषीय विश्वास के रूप में देखा जाता है, किन्तु यह दृष्टिकोण अधूरा है। यदि मुहूर्त का गहन विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि इसके पीछे एक सुव्यवस्थित वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक एवं ब्रह्माण्डीय तंत्र कार्य कर रहा है।
प्रस्तुत शोध-पत्र में मुहूर्त की अवधारणा का वैदिक, उपनिषदिक एवं ज्योतिषीय सन्दर्भों में विश्लेषण करते हुए उसे आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धांतों—विशेषतः जैविक घड़ी (Biological Clock) एवं ब्रह्माण्डीय लय (Cosmic Rhythm)—के आलोक में पुनर्पाठित किया गया है। यह प्रतिपादित किया गया है कि मुहूर्त का चयन मानव शरीर की आन्तरिक लयों, मानसिक अवस्था तथा ब्रह्माण्डीय चक्रों के मध्य समन्वय स्थापित करने का प्रयास है, जो संस्कारों की प्रभावशीलता को सुनिश्चित करता है।
अतः यह शोध यह सिद्ध करने का प्रयास करता है कि मुहूर्त-विज्ञान केवल परम्परा नहीं, बल्कि एक उन्नत “समय-विज्ञान प्रणाली” (Time-Optimization System) है, जो आज भी वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक दृष्टि से प्रासंगिक है।
Keywords
मुहूर्त-विज्ञान, काल सिद्धांत, संस्कार परम्परा, जैविक एवं ब्रह्माण्डीय लय, वैदिक ज्योतिष