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International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary
ISSN: 2583-7397
Open Access • Peer Reviewed
Impact Factor: 5.67

International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2025;4(1):300-303

पं. श्रीराम दवेकृत मेघोपालम्भनम् खण्डकाव्य में लोक-संवेदना

Author Name: रानू शर्मा;   डॉ. त्रिलोक चन्द अवस्थी;  

1. शोधार्थी, संस्कृत, दर्शन एवं वैदिक अध्ययन विभाग, वनस्थली विद्यापीठ, भारत

2. निर्देशक, सहायक आचार्य, संस्कृत, दर्शन एवं वैदिक अध्ययन विभाग, वनस्थली विद्यापीठ, भारत

Abstract

प्रस्तुत अध्ययन में पं. श्रीराम दवे के खण्डकाव्य ‘मेघोपालम्भम्’ का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया है। यह काव्य आधुनिक संस्कृत साहित्य की उस प्रगतिशील प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें युगबोध, सामाजिक चेतना और प्रकृति-मानव संबंधों का सजीव चित्रण मिलता है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि कवि ने मेघों को केवल प्राकृतिक तत्व के रूप में नहीं, बल्कि मानवीकृत रूप में प्रस्तुत कर उनके माध्यम से समाज की आशा-निराशा, विषमता, ग्रामीण जीवन की पीड़ा, कृषक जीवन की कठिनाइयों तथा पर्यावरणीय चिंताओं का यथार्थ चित्रण किया है।

काव्य में कालिदास की ‘मेघदूत’ परंपरा का प्रभाव दिखाई देता है, परंतु दवे जी ने इसे आधुनिक संदर्भों से जोड़कर एक नवीन सामाजिक दृष्टि प्रदान की है। इसमें अतिवृष्टि और अनावृष्टि दोनों स्थितियों का मार्मिक चित्रण मिलता है, जो ग्रामीण जीवन की आर्थिक और सामाजिक समस्याओं को उजागर करता है। साथ ही, कवि ने लोकतांत्रिक व्यवस्था, सामाजिक असमानता और मानवीय संवेदनाओं पर भी गहन विचार प्रस्तुत किए हैं।

अंततः यह कहा जा सकता है कि ‘मेघोपालम्भम्’ केवल प्रकृति-वर्णन नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदना और पर्यावरण चेतना से युक्त एक प्रगतिशील खण्डकाव्य है, जो आधुनिक संस्कृत साहित्य की महत्वपूर्ण कृति के रूप में स्थापित होता है।

Keywords

पं. श्रीराम दवे, मेघोपालम्भम्, आधुनिक संस्कृत साहित्य, युगबोध, प्रगतिशील काव्य, प्रकृति चित्रण, मानवीकरण, ग्रामीण जीवन, सामाजिक विषमता, पर्यावरण चेतना