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IJCRM
International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary
ISSN: 2583-7397
Open Access • Peer Reviewed
Impact Factor: 5.67

International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2026;5(3):698-705

गुप्त काल में स्वास्थ्य सेवा प्रणाली, अस्पताल और सार्वजनिक स्वास्थ्य: एक अध्ययन

Author Name: जितेन्द्र कुमार मीना;   प्रो. डॉ. संजीव कुमार;  

1. विभाग, इतिहास विभाग पंडित दीनदयाल उपाध्याय शेखावाटी विश्वविद्यालय, सीकर, राजस्थान, भारत

2. विभाग, इतिहास विभाग पंडित दीनदयाल उपाध्याय शेखावाटी विश्वविद्यालय, सीकर, राजस्थान, भारत

Abstract

गुप्तकाल (चौथी से छठी शताब्दी ईस्वी) भारतीय इतिहास का स्वर्णिम युग माना जाता है, क्योंकि इस काल में राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक समृद्धि, सांस्कृतिक उत्कर्ष तथा ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति हुई। साहित्य, कला, गणित, खगोलशास्त्र और दर्शन के साथ-साथ चिकित्सा विज्ञान तथा स्वास्थ्य सेवा प्रणाली का भी उल्लेखनीय विकास हुआ। गुप्त शासकों के संरक्षण तथा अनुकूल सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों ने आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति को सुदृढ़ आधार प्रदान किया, जिसके परिणामस्वरूप चिकित्सा ज्ञान का संरक्षण, संवर्धन और संस्थागत विस्तार संभव हो सका।

गुप्तकालीन स्वास्थ्य सेवा प्रणाली मुख्यतः आयुर्वेदिक सिद्धांतों पर आधारित थी, जिसमें स्वास्थ्य को केवल रोगों की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा के संतुलन की अवस्था माना गया। इस काल में स्वास्थ्य संरक्षण, रोग-निवारण, संतुलित आहार, स्वच्छता, योग, व्यायाम तथा नियमित जीवनचर्या पर विशेष बल दिया गया। चिकित्सा व्यवस्था का उद्देश्य केवल रोगियों का उपचार करना नहीं था, बल्कि समाज के समग्र स्वास्थ्य स्तर को बनाए रखना भी था। इस दृष्टि से गुप्तकालीन चिकित्सा प्रणाली आधुनिक सार्वजनिक स्वास्थ्य अवधारणाओं की प्रारंभिक आधारशिला के रूप में दिखाई देती है।

गुप्तकाल में चिकित्सालयों और धर्मार्थ चिकित्सा संस्थानों की व्यवस्था का भी विकास हुआ। चीनी यात्री फाह्यान के यात्रा-वृत्तांत से ज्ञात होता है कि उस समय अनेक नगरों में निर्धनों, रोगियों, वृद्धों तथा असहाय व्यक्तियों के लिए निःशुल्क चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध थीं। इन संस्थानों में रोगियों को औषधियाँ, भोजन तथा आवश्यक देखभाल प्रदान की जाती थी। इससे स्पष्ट होता है कि तत्कालीन समाज में चिकित्सा को सामाजिक उत्तरदायित्व और लोककल्याण के महत्वपूर्ण साधन के रूप में देखा जाता था।

इस काल में औषध विज्ञान (Pharmacology) के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई। वनस्पति, खनिज तथा पशु-आधारित पदार्थों से औषधियों का निर्माण किया जाता था तथा औषध निर्माण की विधियाँ अधिक व्यवस्थित और परिष्कृत हुईं। चरक संहिता, सुश्रुत संहिता तथा वाग्भट्ट के ग्रंथों के अध्ययन और प्रचार-प्रसार ने चिकित्सा ज्ञान को नई दिशा प्रदान की। शल्य चिकित्सा, रोग निदान, प्रसूति चिकित्सा, बाल चिकित्सा तथा विष विज्ञान जैसे क्षेत्रों में भी महत्वपूर्ण विकास देखने को मिलता है।

प्रस्तुत शोध-पत्र में गुप्तकालीन स्वास्थ्य सेवा प्रणाली, चिकित्सालयों की संरचना, चिकित्सा शिक्षा, औषध विज्ञान तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी अवधारणाओं का ऐतिहासिक, विश्लेषणात्मक एवं व्याख्यात्मक अध्ययन किया गया है। यह शोध गुप्तकालीन चिकित्सा व्यवस्था की वैज्ञानिकता, मानवीयता तथा सामाजिक उपयोगिता को रेखांकित करते हुए भारतीय चिकित्सा परंपरा के विकास में उसके योगदान का मूल्यांकन करता है। साथ ही यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि गुप्तकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था न केवल तत्कालीन भारतीय समाज के कल्याण का आधार थी, बल्कि उसने विश्व चिकित्सा इतिहास और सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंतन को भी महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया।

Keywords

गुप्तकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था, आयुर्वेद, चिकित्सालय, सार्वजनिक स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा, औषध विज्ञान, रोग-निवारण, स्वास्थ्य संरक्षण, भारतीय चिकित्सा परंपरा, लोककल्याण।