International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2025;4(1):281-289
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का काव्य-चिंतन:दृष्टि और महत्व
Author Name: प्रो. दीपक प्रकाश त्यागी;
Abstract
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी आलोचना और काव्यचिन्तन के इतिहास में एक युगप्रवर्तक विचारक के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उन्होंने हिन्दी साहित्य को स्वतंत्र काव्यशास्त्रीय आधार प्रदान करते हुए भारतीय परम्परा और पाश्चात्य चिंतन के मध्य समन्वय स्थापित किया। शुक्लजी ने रीतिवाद, कलावाद, रहस्यवाद, अभिव्यंजनावाद तथा व्यक्तिवैचित्र्यवाद जैसी प्रवृत्तियों की आलोचना करते हुए लोकमंगल को साहित्य का सर्वोच्च उद्देश्य माना। उनके अनुसार कविता केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि मानव हृदय की मुक्तावस्था, भावयोग तथा लोकसत्ता के साथ तादात्म्य स्थापित करने का माध्यम है। उन्होंने कविता को लोकजीवन, लोकधर्म, लोकहृदय और विश्वमानवता से जोड़ते हुए साहित्य की सामाजिक उपयोगिता पर बल दिया। रस, साधारणीकरण, कल्पना, प्रतिभा, व्युत्पत्ति तथा अभ्यास संबंधी उनके विचार भारतीय काव्यशास्त्र को नवीन दिशा प्रदान करते हैं। शुक्लजी की दृष्टि में काव्य का अंतिम लक्ष्य मानव हृदय का विस्तार, लोकमंगल की स्थापना तथा समस्त सृष्टि के साथ रागात्मक संबंधों का विकास है। प्रस्तुत अध्ययन में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के काव्यचिन्तन, काव्य-प्रयोजन, रस-सिद्धान्त, लोकमंगलवाद, कल्पना तथा काव्य-हेतु संबंधी अवधारणाओं का विश्लेषणात्मक विवेचन किया गया है।
Keywords
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, काव्यचिन्तन, लोकमंगल, रस-सिद्धान्त, साधारणीकरण, कल्पना, प्रतिभा, भावयोग, हिन्दी आलोचना, काव्यशास्त्र।