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International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary
ISSN: 2583-7397
Open Access • Peer Reviewed
Impact Factor: 5.67

International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2025;4(2):479-484

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और भूमण्डलीकरण की सामाजिक और राजनीतिक प्रासंगिकता

Author Name: प्रदीप सिंह;  

1. शोधार्थी, राजनीति शास्त्र अध्ययनशाला, जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर, मध्य प्रदेश, भारत

Abstract

वर्तमान समय में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ एवं भूमण्डलीकृत विचारधारा पूरे विश्व के लिए एक नई अवधारणा है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का अर्थ है— ‘विश्व हमारा परिवार है।’ विश्व के 210 देश ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की श्रेणी में आते हैं। आज हमारे समक्ष विश्व में कई चुनौतियाँ हैं, जिनको दूर करने के लिए आपस में एक-दूसरे से सहयोग करने की भावना होनी चाहिए। तभी सभी महाद्वीपों में रहने वाले लोगों की समस्याओं का निराकरण हो पाएगा एवं लोगों की सांस्कृतिक एकता, सभ्यता तथा नई विचारधारा का समन्वय संभव होगा और उसके नए प्रतिफल उत्पन्न होंगे। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ न सिर्फ भारत की परिकल्पना है, अपितु भारत का आदर्श भी है। यही कारण है कि भारत रत्न से अलंकृत देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने तात्कालीन विदेश मंत्री के रूप में 4 अक्टूबर, 1977 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 32वें अधिवेशन में हिन्दी में दिए गए अपने भाषण में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा को विश्व समुदाय के समक्ष रखते हुए कहा था कि “हमारा इस अवधारणा में सदैव विश्वास रहा है। सारा संसार एक परिवार है। यह अवधारणा भारत की ज्ञानमय और श्रेष्ठ संस्कृति की देन है, जो विश्व को एक परिवार के रूप में देखती है। इसमें पूरब-पश्चिम का भेद नहीं है, न ही छोटे-बड़े का फर्क है। वह प्रेमपूर्वक, विश्वासपूर्वक सबका आलिंगन करने को अग्रसर है। यह भारतीय संस्कृति का बहुआयामी पक्ष है।” भारतीय संसद के प्रवेश कक्ष पर अंकित यह वाक्यांश भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ एवं भूमण्डलीकृत समाज वर्तमान में विभिन्न अधिकारों के लिए नए प्रकार के मत एवं विचारधाराओं को समृद्ध बनाने का प्रयास कर रहा है, जिससे मानव समाज के मानवाधिकार सुरक्षित एवं संरक्षित रहें। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा के पक्ष में महात्मा गांधी, डॉ. बी. आर. अम्बेडकर, राजा राममोहन राय, बाल गंगाधर तिलक एवं मदन मोहन मालवीय भी थे, जिन्होंने हमेशा मानवाधिकारों के संबंध में पूरे समाज को नए प्रतिफल एवं आयाम प्रदान किए, जिससे पूरे भारतवर्ष में भूमण्डलीकृत समाज का स्वरूप विकसित हुआ। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्व के महान दार्शनिकों एवं चिंतकों ने भी मानवाधिकार के पक्ष में काफी प्रयास किए, जिनमें प्रमुख रूप से रोमां रोलां, दोस्तोयेव्स्की, टेलर, एस. टी. कौलरिज एवं स्टीफन स्पेंडर जैसे महान व्यक्तियों ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की विचारधारा को पूरे विश्व में विस्तारित किया। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा के प्रबल पक्षधर महात्मा गांधी थे। उन्होंने गांधीवादी विचारधारा के प्रमुख घटकों का समग्र विकास किया, जिसका संबंध जीवन के सभी स्वरूपों के प्रति सम्मान, अहिंसा के सिद्धांत एवं ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की विचारधारा से जुड़ा है। इसी विचारधारा की पैरवी वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने भी की है। हाल ही में सार्क, G-20 एवं वर्ल्ड कल्चरल फेस्टिवल में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को आमजन तक पहुँचाने का प्रयास किया गया, जिसमें भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता के विभिन्न आयामों को समृद्ध करते हुए इस विचारधारा को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया गया। इसमें सामाजिकता, राजनीतिकता, गुटनिरपेक्षता एवं भूमण्डलीकृत विविधता की विशेषताओं को दिग्दर्शक के रूप में अभिव्यक्त किया गया है।

Keywords