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International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary
ISSN: 2583-7397
Open Access • Peer Reviewed
Impact Factor: 5.67

International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2025;4(6):631-634

झारखंड की राजधानी रांची में क्षेत्रीय दलों का गठन, संघर्ष और विस्तार

Author Name: अंजुम सदाब;   डॉ. नीतू कुमारी;  

1. शोधार्थी,वाई.बी.एन यूनिवर्सिटी, रांची, झारखण्ड, भारत

2. शोध निर्देशिका, सहायक प्राध्यापक, वाई.बी.एन यूनिवर्सिटी, रांची, झारखण्ड, भारत

Abstract

प्रस्तुत शोध का विषय “झारखंड की राजधानी रांची में क्षेत्रीय दलों का गठन, संघर्ष और विस्तार” झारखंड की समकालीन राजनीति को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह अध्ययन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि झारखंड की राजनीति केवल सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं रही, बल्कि यह एक लंबे सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संघर्ष की उपज रही है। झारखंड आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ने क्षेत्रीय राजनीतिक चेतना को जन्म दिया, जिसकी केंद्रीय भूमि राजधानी रांची बनी। रांची न केवल प्रशासनिक केंद्र के रूप में विकसित हुई, बल्कि उसने झारखंडी अस्मिता, आदिवासी अधिकार और क्षेत्रीय स्वायत्तता के आंदोलन को संगठित स्वरूप प्रदान किया।

इस शोध में यह विश्लेषण किया गया है कि किस प्रकार औपनिवेशिक काल से चले आ रहे भूमि-विस्थापन, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन, सामाजिक उपेक्षा और सांस्कृतिक हाशियाकरण ने जनजातीय समाज में असंतोष उत्पन्न किया। स्वतंत्रता के बाद भी जब यह क्षेत्र बिहार राज्य के अंतर्गत रहा, तब विकास की असमानताओं और प्रशासनिक उपेक्षा ने क्षेत्रीय अस्मिता को और अधिक सशक्त किया। इसी सामाजिक यथार्थ से क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के गठन की प्रक्रिया प्रारंभ हुई, जिसका पहला संगठित रूप झारखंड पार्टी के रूप में सामने आया। आगे चलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा, ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन तथा अन्य क्षेत्रीय संगठनों ने इस चेतना को जनआंदोलन में परिवर्तित किया।

शोध यह स्पष्ट करता है कि रांची ने आंदोलन और राजनीति के बीच सेतु का कार्य किया। यहीं से राजनीतिक रणनीतियाँ बनीं, नेतृत्व विकसित हुआ और जनसभाओं, छात्र आंदोलनों तथा सामाजिक संगठनों के माध्यम से जनसमर्थन सुदृढ़ हुआ। राजधानी होने के कारण प्रशासनिक संस्थानों, विश्वविद्यालयों और मीडिया की उपस्थिति ने क्षेत्रीय दलों को वैचारिक तथा संगठनात्मक विस्तार प्रदान किया। रांची विश्वविद्यालय से निकली छात्र राजनीति ने क्षेत्रीय दलों को नई पीढ़ी का नेतृत्व सौंपा, जिसने आंदोलन को व्यापक सामाजिक आधार दिया। इस अध्ययन में यह भी विवेचित किया गया है कि क्षेत्रीय दलों का संघर्ष केवल अलग राज्य की मांग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसमें जल-जंगल-जमीन, भाषा, संस्कृति, रोजगार, विस्थापन और स्थानीय स्वशासन जैसे मुद्दे निरंतर शामिल रहे। 2000 में झारखंड राज्य निर्माण इन संघर्षों की ऐतिहासिक परिणति थी, परंतु इसके बाद भी क्षेत्रीय दलों की भूमिका समाप्त नहीं हुई। राज्य गठन के पश्चात ये दल आंदोलनकारी स्वरूप से निकलकर शासन और नीति-निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा बने। शोध में यह निष्कर्ष सामने आता है कि राज्य निर्माण के बाद क्षेत्रीय दलों को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जैसे गठबंधन राजनीति, सत्ता का दबाव, वैचारिक विचलन और जनअपेक्षाओं की पूर्ति। इसके बावजूद क्षेत्रीय दल आज भी झारखंड की राजनीति में प्रासंगिक बने हुए हैं। वे स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ते हैं और लोकतांत्रिक ढांचे में क्षेत्रीय संतुलन स्थापित करते हैं।

अंततः यह शोध प्रतिपादित करता है कि झारखंड की राजधानी रांची में क्षेत्रीय दलों का गठन, संघर्ष और विस्तार केवल राजनीतिक घटनाक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, पहचान की राजनीति और लोकतांत्रिक अधिकारों की सामूहिक यात्रा है। यह अध्ययन झारखंड की राजनीति को समझने के लिए एक ऐतिहासिक और विश्लेषणात्मक आधार प्रस्तुत करता है तथा भविष्य के शोध के लिए नई दिशाएँ उद्घाटित करता है।

Keywords

झारखंड आंदोलन, रांची, क्षेत्रीय दल, आदिवासी राजनीति, झारखंड मुक्ति मोर्चा, छात्र आंदोलन, पहचान की राजनीति, क्षेत्रीय चेतना, राज्य निर्माण, लोकतांत्रिक संघर्ष।