International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2025;4(1):178-186
ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण में स्वयं सहायता समूहों की भूमिका: एक समाजशास्त्रीय विश्लेषण
Author Name: बसुंधरा शुक्ला; राजश्री मठपाल;
Paper Type: research paper
Article Information
Abstract:
ग्रामीण भारत में महिलाओं का सशक्तिकरण सतत विकास का एक महत्वपूर्ण आधार है। लंबे समय तक सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक असमानताओं के कारण ग्रामीण महिलाएँ निर्णय-निर्माण, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार तथा वित्तीय संसाधनों तक सीमित पहुँच रखती थीं। ऐसे परिदृश्य में स्वयं सहायता समूह महिलाओं के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा मनोवैज्ञानिक सशक्तिकरण के प्रभावी माध्यम के रूप में उभरे हैं। स्वयं सहायता समूह महिलाओं को बचत, ऋण सुविधा, उद्यमिता विकास, नेतृत्व क्षमता तथा सामुदायिक भागीदारी के अवसर प्रदान करते हैं। प्रस्तुत लेख का उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण में स्वयं सहायता समूहों की भूमिका का समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से विश्लेषण करना है। लेख में सशक्तिकरण की अवधारणा, SHGs की संरचना एवं कार्यप्रणाली, महिलाओं के जीवन में आए बहुआयामी परिवर्तनों तथा उनके समक्ष विद्यमान चुनौतियों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि स्वयं सहायता समूह केवल आर्थिक संस्था नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन के सशक्त माध्यम हैं, जो महिलाओं में आत्मविश्वास, सामाजिक प्रतिष्ठा, निर्णय लेने की क्षमता तथा सामूहिक चेतना का विकास करते हैं।
Keywords:
ग्रामीण महिला, महिला सशक्तिकरण, स्वयं सहायता समूह, सामाजिक परिवर्तन, आर्थिक सशक्तिकरण, ग्रामीण विकास।
How to Cite this Article:
बसुंधरा शुक्ला,राजश्री मठपाल. ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण में स्वयं सहायता समूहों की भूमिका: एक समाजशास्त्रीय विश्लेषण. International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary. 2025: 4(1):178-186
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