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International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary
ISSN: 2583-7397
Open Access • Peer Reviewed
Impact Factor: 5.67

International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2026;4(1):316-321

ग्रामीण महिलाओं में प्रसवोत्तर अवसाद: एक समाजशास्त्रीय विश्लेषण

Author Name: आयुषी गुप्ता;   आरती कुमारी;  

1. Research Scholar, Department of Sociology, Banasthali Vidyapith, Rajasthan, India

2. Assistant Professor, Department of Sociology, Banasthali Vidyapith, Rajasthan, India

Paper Type: research paper
Article Information
Paper Received on: 2025-01-04
Paper Accepted on: 2025-02-26
Paper Published on: 2025-02-28
Abstract:

प्रसवोत्तर अवसाद मातृ मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित एक गंभीर एवं बहुआयामी समस्या है, जो केवल जैविक अथवा मनोवैज्ञानिक कारणों तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा पारिवारिक परिस्थितियों से भी गहराई से प्रभावित होती है। प्रस्तुत अध्ययन में प्रसवोत्तर अवसाद का विश्लेषण समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से किया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य सामाजिक संरचना, लैंगिक संबंधों, पारिवारिक सहयोग, आर्थिक स्थिति तथा सांस्कृतिक मान्यताओं के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है। अध्ययन में संरचनात्मक-क्रियात्मक सिद्धांत, नारीवादी, जुड़ाव सिद्धांत तथा लेबलिंग सिद्धांत के माध्यम से प्रसवोत्तर अवसाद की समाजशास्त्रीय व्याख्या प्रस्तुत की गई है। संरचनात्मक-क्रियात्मक दृष्टिकोण यह स्पष्ट करता है कि परिवार एवं अन्य सामाजिक संस्थाओं द्वारा पर्याप्त भावनात्मक, सामाजिक तथा आर्थिक सहयोग न मिलने पर मातृ मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है और सामाजिक संतुलन में व्यवधान उत्पन्न होता है। नारीवादी एवं जेंडर सिद्धांत यह दर्शाते हैं कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था, लैंगिक असमानता, घरेलू कार्यों का असमान वितरण, आर्थिक निर्भरता तथा महिलाओं की सीमित निर्णय क्षमता प्रसवोत्तर अवसाद की संभावना को बढ़ाती है। जुड़ाव सिद्धांत यह प्रतिपादित करता है कि मातृ मानसिक स्वास्थ्य का सीधा प्रभाव माँ-शिशु संबंधों तथा शिशु के भावनात्मक एवं सामाजिक विकास पर पड़ता है। वहीं, लेबलिंग सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सामाजिक कलंक एवं नकारात्मक सामाजिक धारणाएँ महिलाओं को सहायता प्राप्त करने से रोकती हैं, जिससे उनकी मानसिक स्थिति और अधिक जटिल हो जाती है।अध्ययन से यह निष्कर्ष प्राप्त होता है कि प्रसवोत्तर अवसाद को केवल चिकित्सकीय समस्या के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह सामाजिक संरचना, लैंगिक असमानता, आर्थिक विषमता, पारिवारिक संबंधों तथा सामाजिक समर्थन की उपलब्धता से निर्मित एक व्यापक सामाजिक समस्या है। विशेष रूप से ग्रामीण भारत में घरेलू हिंसा, पुत्र वरीयता, सीमित स्वास्थ्य सेवाएँ, सामाजिक असमानताएँ तथा महिलाओं की आर्थिक निर्भरता इस समस्या को और अधिक गंभीर बनाती हैं। अतः मातृ मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाने के लिए बहुआयामी हस्तक्षेप आवश्यक हैं, जिनमें समय पर मानसिक स्वास्थ्य जाँच, परामर्श सेवाओं का विस्तार, परिवार एवं समुदाय का सक्रिय सहयोग, महिलाओं का सामाजिक एवं आर्थिक सशक्तिकरण, लैंगिक समानता को बढ़ावा तथा मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रमों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का समावेश प्रमुख हैं। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण प्रसवोत्तर अवसाद को व्यापक सामाजिक संदर्भ में समझने तथा प्रभावी नीतियों एवं हस्तक्षेपों के निर्माण हेतु एक सशक्त वैचारिक आधार प्रदान करता है। यह अध्ययन चिकित्सा समाजशास्त्र, महिला अध्ययन, ग्रामीण समाजशास्त्र तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने की क्षमता रखता है।

Keywords:

प्रसवोत्तर अवसाद, मातृ मानसिक स्वास्थ्य, ग्रामीण महिलाएँ, समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण, संरचनात्मक-क्रियात्मक सिद्धांत, नारीवादी सिद्धांत, लेबलिंग सिद्धांत, जुड़ाव सिद्धांत।

How to Cite this Article:

आयुषी गुप्ता,आरती कुमारी. ग्रामीण महिलाओं में प्रसवोत्तर अवसाद: एक समाजशास्त्रीय विश्लेषण. International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary. 2026: 4(1):316-321


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