International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2026;5(4):672-678
वैश्वीकरण के बाद उभरे नए शहरी मध्यवर्ग का भारतीय चुनावों और चुनावी मुद्दों पर प्रभाव
Author Name: डॉ. अशोक कुमार मीना;
Abstract
वर्ष 1991 के आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के पश्चात् भारत के सामाजिक-आर्थिक ढांचे में व्यापक संरचनात्मक परिवर्तन आए हैं। इन परिवर्तनों का सबसे सशक्त अभिव्यक्ति के रूप में 'नए शहरी मध्यवर्ग' का अभ्युदय हुआ है। यह वर्ग केवल एक आर्थिक श्रेणी नहीं है, बल्कि एक विशिष्ट सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। प्रस्तुत शोध पत्र का मुख्य उद्देश्य यह विश्लेषित करना है कि किस प्रकार 1991 के बाद निर्मित इस नए शहरी मध्यवर्ग ने भारतीय चुनावी राजनीति, मतदान व्यवहार, राजनीतिक विमर्श तथा चुनावी मुद्दों के प्राथमिकीकरण को प्रभावित किया है।
अध्ययन में यह पाया गया है कि पारंपरिक भारतीय राजनीति जहां मुख्य रूप से जाति, धर्म, क्षेत्र और लोकलुभावन कल्याणकारी घोषणाओं पर केंद्रित थी, वहीं नए शहरी मध्यवर्ग के प्रसार ने 'विकास', 'सुशासन' 'भ्रष्टाचार-मुक्त प्रशासन', 'विश्वस्तरीय अवसंरचना' और 'आर्थिक सुधारों' को चुनावी राजनीति के मुख्यधारा के एजेंडे में ला खड़ा किया है। यह पत्र 2009, 2014, 2019 और 2024 के आम चुनावों के साथ-साथ दिल्ली, मुंबई और बेंगलोर जैसे प्रमुख महानगरों के स्थानीय चुनावों के संदर्भ में इस वर्ग के राजनीतिक प्रभाव का गहन मूल्यांकन करता है। अध्ययन यह भी रेखांकित करता है कि किस प्रकार इस वर्ग ने सूचना प्रौद्योगिकी, सोशल मीडिया और नागरिक समाज आंदोलनों के माध्यम से सार्वजनिक राय को आकार दिया है। निष्कर्ष यह दर्शाते हैं कि यद्यपि यह वर्ग संख्यात्मक दृष्टि से अभी भी बहुसंख्यक नहीं है, परंतु अपनी राय-निर्माता क्षमता, आर्थिक शक्ति और मीडिया में मजबूत उपस्थिति के कारण यह भारतीय लोकतंत्र की दिशा तय करने में एक अत्यंत निर्णायक कारक बन चुका है।
Keywords
वैश्वीकरण, नया शहरी मध्यवर्ग, चुनावी मुद्दे, सुशासन, विकास राजनीति, राजनीतिक सहभागिता, सोशल मीडिया, भारत में चुनाव।