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International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary
ISSN: 2583-7397
Open Access • Peer Reviewed
Impact Factor: 5.67

International Journal of Contemporary Research In Multidisciplinary, 2025;4(1):267-271

21वीं सदी की हिंदी कहानियों में कृषक जीवन का यथार्थवादी चित्रण

Author Name: मोनू स्वामी;  

1. शोधार्थी, हिंदी, ज्योति विद्यापीठ महिला विश्वविद्यालय, जयपुर, राजस्थान, भारत

Abstract

21वीं सदी की हिंदी कहानियों में कृषक जीवन का यथार्थवादी चित्रण” विषय समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में ग्रामीण समाज और किसान वर्ग की बदलती परिस्थितियों का बहुआयामी अध्ययन प्रस्तुत करता है। वैश्वीकरण, तकनीकी विकास, भूमिहीनता, बाजारवाद, पर्यावरणीय संकट और बदलती सामाजिक संरचनाओं ने किसान जीवन को गहरे रूप से प्रभावित किया है इन जटिलताओं का संवेदनशील और प्रामाणिक चित्र 21वीं सदी के कहानीकारों की रचनाओं में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

समकालीन कहानियाँ किसान जीवन को केवल गरीबी, शोषण और संघर्ष तक सीमित नहीं करतीं, बल्कि उनके मानसिक द्वंद्व, भावनात्मक दुनिया, सामाजिक पहचान, पारिवारिक संबंधों, कृषि-आधारित संस्कृति, स्त्री-श्रम, पलायन और किसान आंदोलनों जैसे विविध पक्षों को भी यथार्थवाद के साथ उभारती हैं। बदलते ग्रामीण परिदृश्य में किसानों की चुनौतियों कर्ज, फसल संकट, आत्महत्या, सरकारी नीतियों की विफलता तथा तकनीकी परिवर्तन इन सभी को आज के कहानीकार नए दृष्टि-बिंदु से देखते हैं।

इसके साथ ही, प्रेमचंद, रेणु, नागार्जुन, निर्मल वर्मा, संजीव, उदयप्रकाश, शिवमूर्ति जैसे लेखकों की परंपरा और समकालीन दृष्टि मिलकर कृषक जीवन के साहित्यिक प्रतिबिंब को अत्यंत प्रामाणिक, मानवीय और संवेदनशील बनाती है। यह साहित्य न केवल किसान की पीड़ा और संघर्ष को उजागर करता है, बल्कि सामाजिक न्याय, आत्मसम्मान, सामूहिक चेतना और ग्रामीण अस्मिता जैसे तत्वों को भी सशक्त ढंग से प्रस्तुत करता है।

इस प्रकार, 21वीं सदी की हिंदी कहानियाँ कृषक जीवन का ऐसा यथार्थवादी चित्र उभारती हैं जो सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक सभी स्तरों पर किसान की बदलती दुनिया को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

Keywords

कृषक जीवन, समकालीन हिंदी कहानी, ग्रामीण यथार्थ, किसान विमर्श, कृषि संकट, किसान आंदोलन, ग्रामीण परिवर्तन, वैश्वीकरण और कृषि, स्त्री–किसान, पलायन, पर्यावरणीय संकट, सामाजिक न्याय, ग्रामीण अस्मिता, कथा-साहित्य, बाजारवाद